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Why should the river always flow towards the Ocean? Is it just out of love, obsession or devotion?

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It has often been suggested by my dear friend HariOm about the devotional obsessive behaviour of River which drives her to go and dissolve in the Ocean. Here is his couplet:
"ऐसा भी क्या दीवानापन ऐसा भी क्या प्यार नदी,  सागर से मिलने जाती है तू ही क्यों हर बार नदी ?"
This often made me wonder the emotions behind depicting this as thoughtless one side obsession of river, which consists of pristine, pure, soft water - to drift and submerge in the vast ocean, which is wild, salty, destructive, immense, unimaginably different and rough.

Well, I figured it out, that it's just a figment of human imagination, and we obviously ignore the real basis of this process. It's not love, it higher than that. It's creation. It's about making sure everything functions. 


And even though it looks like a mere one-sided journey, ocean play's its fair role in creating, strengthening and charting the very path of the river. 


There is always a better reason for why things happen the wa…

Madaari ka Bandar

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बड़ी कशमकश है, बड़ी बुज़दिली है,
ये कैसी सज़ा जानवर को मिली है?

चन्द पैसों की खातिर, मदारी का बंदर,
तालियों पे तमाशे किए जा रहा है!

वो थक भी गया है, डरा भी हुआ है
नहीं भूख उसको, दबी प्यास उसकी

वो जंगल के आज़ाद पेड़ों का राजा,
तार पे चल तमाशे किए जा रहा है...

ज़िंदा रहने को रोटी मिली भी तो क्या है?
नींद मालिक की मर्ज़ी से मिलती, तो क्या है?

ना है छाँव घर की, ना अपने निकट में,
घनी धूप में भी घना है अंधेरा...

वतन छोड़ पीछे, डरा आँख मीचे
वो करतब पे करतब किए जा रहा है!

हमने माना की जंगल में सूखा पड़ा था,
था छोटा सा जंगल, वो प्यारा सा जंगल

वो अलबेली मीठी सी यादों का जंगल
वो अपनो का जंगल, जो सूखा पड़ा था

नहीं बच गयी थीं बहुत ढेर फलियाँ
था तालाब सूखा, थीं मुरझाईं कलियाँ

ना जाने कहाँ से मदारी के फेके
हुए जाल में वो फली ढूँढने को
अकेला चला था

वो लालच था शायद, या फिर भूख थी
जो उसे जाल मे खींच के ले गयी थी

गिरा, उठ ना पाया;
फँसा, बच ना पाया
मगर चीख कर, बाकियों को बचाया
उसे बाँधकर वो शहर लेके आया

चार दिन की चमक, रोटियों के मज़े
भूल बैठा वो रस्ता, किधर से था आया

वो यह सोचता है, अकेले मे अब भी
कहाँ को था निकला, कहाँ लौट आया! 

Bheed ka Majnu, Raat ka saaya...

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भीड़ मे छुपा हुआ, भीड़ से छुपा हुआ,
मजनूओँ की फौज में, वो फिर से जा खड़ा हुआ.

इश्क़ का बहाना था, अलग कुछ फसाना था,
झूठ की मुहब्बत थी, मतलबी दीवाना था !

दिल्फ़रेबी आती थी, खुद को ही जलाना था.
खुद को मारके, अपनी लाश को छुपाना था.

अब करे तो क्या करे, वो कशमकश में जा फ़सा!

ठोकरों को खा चुका, दर्द को दबा चुका,
अश्क़ आबशार कर, वो दस बरस बहा चुका.

अब करे तो क्या करे? वो अब कहे तो क्या कहे?
कैसे वो बता सके, की सोच की बीमारी है!
एक जुनून तारी है, रोग बड़ा भारी है.
अजनबी मुहब्बत है, अजनबी से यारी है !
कुछ भी नहीं मुमकिन, बस ख्वाब की सवारी है? ज़ख़्म भरने आई जो, छुरी उसी ने मारी है.

किसको वो बता सके, घाव को दिखा सके?
दिल के कुछ दराज़ों में दर्द फिर छुपा सके!

फिर से खिलखिला सके, फिर से मुस्कुरा सके?
फिर घनेरी शाम को, दो घूँट पीके जाम के

भीड़ मे छुपा हुआ, भीड़ से छुपा हुआ,  मजनूओँ की फौज में, वो फिर से जा खड़ा हुआ.




    - सुखनवर सख़्त-जानी


Khwaahish....ek bhikhmange jaisi!!

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सड़क किनारे बैठे बूढ़े भिखमंगे की ख्वाहिश क्या है?
खाना, सोना, जीते जाना....
तू भी तो भिखमंगा ही है!
ख्वाब तेरे भिखमंगे जैसे! 
खाना, उसके हाथ का खाना, खाना, उसके हाथ से खाना,
खाना, उसके साथ ही खाना, खाना, कभी फ़ुर्सत से खाना!
नींद की ख्वाहिश कैसी तेरी.....?
नींद वही भिखमंगे वाली, थक कर गिरना, फट सो जाना,
सो कर उठना, ख़टते जाना,
ख्वाबों के एक महल में जाकर, तकिया साधे झट सो जाना 
अलबेले ख्वाबों के नायक  तू चाहे है जीते जाना! 
जीते जाना? वो क्यूँ आख़िर.... ये जीना भी क्या जीना है?
ऐसा जीना, क्या जीना है?
वजन बढ़ाके, नींद घटाके, चिंता, फ़िक्र, को गले लगाके?
साँस भी लेने को ना रुकना?  दिन ढलने तक दौड़ लगाना?
रात को नींद की गोली खाकर, चाँद को तक्ना, नींद ना आना,
ना सुस्ताना, ना मुस्काना, ना अपनों में आना जाना?
पैसे का अंबार लगाके, बीमारी पे खर्चते जाना? 
इसको तू जीना कहता है? इससे तो भिखमंगा अच्छा...!
मेरी मान, तो बाग़ी हो जा, कभी कभी बैरागी हो जा,
सुस्ता ले, कभी साँस भी ले ले, जीने के माएने बदल ले,
सीख कभी भिखमंगे से भी, वो कैसे जीता रहता है,
कम ख़ाके, कम सो के, वो अपनी ही चाल चला करता है,
तू चाहे तो चाँद जीत ले, या पूरा ब्रह्मां…

Fear...as I know it!!

Why do we get afraid? What haunts us? Is it the dark past or the uncertain future? I wish to answer myself some of my own doubts through this post.
We fall, so that we can learn how to get up. Still we are unsecure about falling. Most of the time. When we are unaware of concrete facts, and we go on thinking about it, it leads up to fear. Fear from the fact that this unawareness could lead us to darkness. If it may hamper my plans I wish to obtain. If it may lead to my failure, and victory of something I hate to see winning against me.
Often we give up on our confidence. It’s not un-natural. Not abnormal. It’s just a sinusoidal trough of our confidence level. Our daily lives, appear to be the same. But every day exposes something new to us- something which may be pleasant to our senses or simply unpleasant experiences. When these unpleasant thoughts clog up our memory, we cease to see beyond the obvious. We forget the pleasant experiences, and the achieved goals. Simply because our mi…

Thank You, Jesus!!

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“Gratitude is the best attitude. There is not a more pleasing exercise of the mind than gratitude. It is accompanied with such an inward satisfaction that the duty is sufficiently rewarded by the performance.”- Infamous Unknown
On this very holy night when 2000 years back Jesus claimed to have risen from the dead, with those paper lanterns burning and hanging from those tree, which I see from this window, I believe there is something else that claims to have risen from the dead. I believe it’s my urge to write. Dear Readers, this mail was a long due. My apologies for not being around for a while. Being around 6500 kms away from the land I call my home, I thing I have some time to sit down, and write. With this fresh mind, and the odd time to wake up, I have woken up, I need to pay my due.
I have suddenly started feeling this loneliness peeking in, through this very window, which is insulating me from the negative two degrees of temperature outside. Apparently, I am very much missing tha…

Open Letter to APR from within